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Supreme Court : सुप्रीम कोर्ट के अहम टिप्पणी : अग्रिम जमानत खारिज हो सकेला, बाकिर सरेंडर के आदेस ना दे सकी अदालत

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नई दिल्ली। सुप्रीम काेर्ट एगो महत्वपूर्ण फैसला में अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail) के नियम पs साफ टिप्पणी कइले बा। कोर्ट कहले बा कि अदालत के अधिकार बा कि ऊ अग्रिम जमानत के याचिका खारिज कs सकेला, बाकिर याचिका खारिज करत घरी आरोपी के जबरदस्ती सरेंडर करे के आदेस ना दे सकेला।

सुप्रीम कोर्ट के का कहनाम बा?

जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां के बेंच सुनवाई के दौरान कहलस कि अदालत के सीमा (जूरिस्डिक्शन) तय बा। अगर कोर्ट के लागेला कि आरोपी के अग्रिम जमानत ना मिले के चाहीं, तs ऊ याचिका खारिज कs सकेला। बाकिर आरोपी के ट्रायल कोर्ट में सरेंडर करे के आदेस देवे के अधिकार नइखे।

झारखंड केस से जुड़ल बा ममिला

ई ममिला झारखंड हाईकोर्ट के एगो पुरान आदेस से जुड़ल बा। हाईकोर्ट जमीन विवाद के ममिला में आरोपी के अग्रिम जमानत याचिका खारिज कइले रहे आ संगही इहो कहले रहे कि आरोपी निचला अदालत में सरेंडर करे आ नियमित जमानत खातिर आवेदन देवे।

सुप्रीम कोर्ट हाईकोर्ट के फैसला पs उठवलस सवाल

सुप्रीम कोर्ट हाईकोर्ट के ई तरीका गलत बतावत कहलस कि सरेंडर के आदेस देहल अदालत के अधिकार क्षेत्र से बाहर बा। कोर्ट साफ कहलस कि अग्रिम जमानत के मकसद गिरफ्तारी से सुरक्षा दिहल बा। अगर राहत ना देवे के होखे तs याचिका खारिज कइल जा सकेला, बाकिर आरोपी पs सरेंडर के दबाव नइखे बनावल जा सकत।

ममिला में का आरोप रहे

जानकारी के अनुसार, आरोपी पs आईपीसी के कइयन गो धारा लागल रहे, जइसे धारा 323 (मारपीट), 420 (धोखाधड़ी), 468 (जालसाजी) आ 471 (फर्जी दस्तावेज के इस्तेमाल)। एह ममिला में शिकायत मजिस्ट्रेट कोर्ट में दर्ज कइल गइल रहे।

सुप्रीम कोर्ट के ई फैसला न्यायिक प्रक्रिया में अधिकार के सीमा के साफ-साफ तय करत बा आ भविष्य में एह तरे के ममिलन में मार्गदर्शन के काम करी।

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