[the_ad_group id="30365"]

बाबूजी-2 (कविता) मैकश के कलम से

[the_ad_placement id="above-content"]

Share

घर के जानल पहचानल अनजान बाबूजी

हो गइले जइसे कवनों गाछ पुरान बाबूजी

घर आंगन दुआर के लाठी रखवार बाबूजी

आन्ही रोकत जइसे माटी के देवार बाबूजी

सर्दी के ठंडी गर्मी के जइसे उमस बाबूजी

लउटेले जइसे लउटे खलिया बस बाबूजी

थाक जाले जइसे सरेह के थाकल बाबूजी

एक भोरे के जइसे खेत के हाकल बाबूजी

मीठ से हो गइले तिता खारा जल बाबूजी

तपिस में सुखल जइसे चापाकल बाबूजी

गइले चिंता में निमक नियन गल बाबूजी

जइसे बोखार में गलल देह के बल बाबूजी

अपने घर में अपने लोग के आह बाबूजी

घर में बचल जइसे कोना-कोनाह बाबूजी

अइसे अकेला ! पइसा में हिसदार बाबूजी

चार किता घर के बेघर किरायदार बाबूजी

मैकश के परिचय

 

गांव के माटी-पानी में सनाइल एगो नब्बे के दशक के भारतीय जवना के आपन भाषा आ संस्कृति में अटूट विश्वास आ लगाव बा। ‘मैक़श’ के परिचय इंहा एगो अइसन साधारण आ जमीन से जुड़ल नवसिखुआ लइका से बा जवना के कलम आ शब्द नवहन के बात करेला। उ संवेदना, भाव आ अंदाज के लिखे के एगो छोटहन कोसिस जवना के समाज आ लोग साधारणतः नजरअंदाज क देला।

[the_ad_placement id="below-content"]

Share this article

Facebook
Twitter X
WhatsApp
Telegram
 
[the_ad_placement id="sidebar-1st"]
[the_ad_placement id="sidebar-2nd"]
[the_ad_placement id="sidebar-3rd"]