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विधिक आलेख – इच्छा मृत्यु : जिंदगी अउर मौत के बीच अधिकार के सवाल…

लेखक परिचय - लेखक पेशा से अधिवक्ता बाड़ें अउर सामाजिक सांस्कृतिक गतिविधिन में सक्रिय रहेलें। साहित्य में रुचि रखेलन अउर लेखन, चर्चा आ बौद्धिक विमर्श में गहिरा रुचि रखेलन।

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इच्छा मृत्यु के जिक्र हमहन लोग बचपने से कथा-कहानी में सुनल गईल बानी जा। महाभारत के भीष्म पितामह के नाम के ना जानत होई ? उनकर इच्छामृत्यु के शक्ति के बखान से त सभे कोई परिचित बा। शरशय्या पर पड़ल पड़ल ऊ आपन प्राण के तबले त्याग नइखे कइले जबले उनकर इच्छा नाही भईल। आज के समय में कानूनी क्षेत्र में जब कोर्ट कचहरी के मुकदमा में ई विषय पर बहस होला अउर ई विषय चर्चा के केंद्र में आ जाला त एहकर चर्चा करल प्रासंगिक हो जाला। आप ई आलेख में हम आज रउवा लोगन के एहि विषय के बारे में विस्तार से जानकारी देब।

का बा इच्छा मृत्यु ?

इच्छा मृत्यु के कानूनी सन्दर्भ में एगो अधिकार के रूप में देखल जाला। बोलचाल के भाषा में कहल जाय त एहकर मतलब होला ‘मुवले के अधिकार’। एहके अंग्रेजी में ‘मर्सी किलिंग’ नाम से भी जानल जाला। एहमें कौनो मनई के दर्द रहित मौत दिहलें के खातिर डॉक्टरी सलाह से ओहकर चिकित्सा सुविधा के हटा दिहल जाला अउर ओहके दर्द अउर कष्ट के बिना मौत दिहलें के इंतजाम करल जाला।

इच्छा मृत्यु अउर हमहन के संविधान :

हमहन के भारतीय संविधान में इच्छा मृत्यु से संबंधित कवनो प्रावधान सीधा तौर पर लिखल नाहीं गईल लेकिन बड़हन अदालतन में एहपर बहुते नामी गिरामी मुकदमा भईल बा अउर अदालतन के बहुत सारा फैसला नजीर भी मानल जाला। हमहन के संविधान के अनुच्छेद 21 में जीवन के अधिकार के चर्चा कइल गईल बा। भारत में सबसे पहिला बेर जिनगी के अधिकार के साथे साथे मौत के अधिकार के जिक्र सबसे पहिले महाराष्ट्र के मुंबई उच्च न्यायालय (हाई कोर्ट) ‘महाराष्ट्र राज्य बनाम मारुति श्रीपति दुबल’ के प्रसिद्ध मुदकमा में कइले रहल। ई मुकदमा में अदालत जिनगी के अधिकार के अंदर मौत के अधिकार के सवाल के भी शामिल कइलस। एकरे बाद हमरे देश के माननीय सुप्रीम कोर्ट एही मुद्दा पर एगो दूसर मुकदमा ‘पी. रथिनम बनाम भारत संघ’ में भी चर्चा कइलस अउर ई मुद्दा के मान्यता भी दिहलस। हालांकि आगे जाके एगो दूसरे मुकदमा ‘ज्ञान कौर बनाम पंजाब राज्य’ में सुप्रीम कोर्ट एह बात से अलग हटके ई कहलस कि हमहन के संविधान के अनुच्छेद 21 में दिहल गईल जीवन के अधिकार के गारंटी में मौत के अधिकार के शामिल नाहीं मानल जाई।
एकरे बाद भारत में एगो बहुते संवेदनशील मामला उठल। ऊ मामला रहल अरुणा शानबाग के मामला। अरुणा शानबाग बलात्कार के शिकार रहलीं और उनकर ज़िन्दगी नरक हो गईल रहल काहे से कि ऊ बुरी तरह से लकवाग्रस्त रहलीं अउर उनकर ज़िन्दगी बहुते कष्टप्रद रहल। माननीय सुप्रीम कोर्ट ई मुद्दा पर सुनवाई करते सन 2018 में ऐतिहासिक फैसला दिहलस अउर ऊ फैसला में साफ कह दिहलस कि हमहन के संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत इज्जत से मरले के हक़ भी शामिल बा अउर मृत्यु प्राप्त कइले के अधिकार जीवन के अधिकार के अभिन्न अंग बा।

वर्तमान में इच्छा मृत्यु के का स्थिति बा ?

वर्तमान में हमहन के देश में केवल निष्क्रिय इच्छामृत्यु के इजाजत दिहल गईल बा। एकर मतलब ई नहीं बा कि मनई लोगन के आत्महत्या के अधिकार मिल गईल। आत्महत्या कइले के प्रयास आ चाहे ओकर खातिर उकसावा दिहले के कार आज भी भारतीय दंड संहिता के धारा 306 के अंतर्गत एगो बड़हन अपराध बा। एह मारे ई समझे के पड़ी की एह समय हमहन के देश में केवल गंभीर चिकित्सकीय मामला में ही इच्छा मृत्यु दिहले के संभावना बा, ओकरो खातिर न्यायालय से अनुमति लेवे के पड़ी। अइसन स्थिति में इच्छा मृत्यु चाहे वाला मनई के ज़िन्दगी बचावे वाला कृत्रिम उपकरण अउर प्रणाली के हटा दिहल जाला और ओहके दवा दारू बंद कइल दिहल जाला ताकि ऊ रोग के भोग भुगुत अउर कष्ट से मुक्ति पा सके।

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इच्छा मृत्यु के अधिकार के समर्थक लोग का कहेलें ?

जवन लोग इच्छा मृत्यु के अधिकार के समर्थन करेलन उनकर तर्क ई बा कि एकरे माध्यम से कौनो मनई के असहनीय दर्द, पीड़ा अउर कष्टप्रद भोग भुगुत से मुक्ति मिलेला। एहसे लंबा समय से बीमार पड़ल लोग के लमहर मृत्यु से छुटकारा मिल जाला। उनकर मान्यता बा कि इंसान अगर कष्टप्रद ज़िन्दगी के बजाय चैन से मरल चाहेला त ओके ई अधिकार मिले के चाही। बीमारी से बुझल, कष्टप्रद अउर परेशान जीवन जियले खातिर मजबूर करले के कार मनई के गरिमा से भरल जिनगी जियले के अधिकार के खिलाफ बा। ई व्यक्तिगत पसंद के अधिकार के भी ख़िलाफ़ बा। इच्छा मृत्यु के पक्ष लेवे वाले डाक्टर लोग के ई विचार बा कि हमहन के देश जइसन विकासशील देश में चिकित्सा सुविधा के विकास अभी ओह स्तर के नाहीं बा जइसन होखे के चाही। अइसन हालत में इच्छा मृत्यु दिहले के कार उचित बा। एहसे डाक्टरन के ऊर्जा के प्रयोग असाध्य रोगन के इलाज के बजाय जरूरी रोगन के इलाज में कइल जाइ त बेहतर रही। बहुत से लोगन के इहो राय बा कि इच्छा मृत्यु के अधिकार दिहलें से न केवल रोगी के असहनीय दर्द से मुक्ति मिलेला बल्कि उनके नात भ्रात रिश्तेदारन के भी मानसिक तनाव अउर आर्थिक परेशानी से मुक्ति मिल जाइ।

इच्छा मृत्यु के अधिकार के विरोधी लोग का कहेलें ?

जवन लोग इच्छा मृत्यु के अधिकार के विरोध करेलन उनकर तर्क ई बा कि चिकित्सा जगत के आपन एगो नैतिकता होले। ओहकर प्रमुख काम जिंदगी के रक्षा करल बा ना कि केहू के जान लेवल। बीमार मनई के देखभाल आ उचित उपचार कइले के कार बा ना कि ओके मुआ देवे के।
विरोधी लोग इहो मानेलन कि मानव जीवन कुदरत के एगो अनमोल तोहफा बा। अइसे में ओके जान बूझ के खतम कइले के प्रयास धर्म अउर नैतिकता के खिलाफ बा। उनकर मान्यता बा कि हमहन के समाज में बूढ़ पुरनिया अउर दिव्यांग लोगन के एगो संवेदनशील वर्ग बा। इच्छा मृत्यु के अधिकार उन्हन के आत्मविश्वास के कमजोर बना देई अउर मृत्यु के मार्ग चुनले खातिर गलत भावना के संचार करी।

अंत में हम इहे कहल चाहब कि बौद्धिक चर्चा और वाद विवाद आपन जगह ठीक बा लेकिन ई सब से अलग सच्चाई इहे बा कि न त जिंदगी के केहू के नियंत्रण का अउर न मौत पे। जे जियता ऊ एक न एक दिन मरी जरूर। जब जन्म लेवल अपने अधिकार अउर पसंद से बाहर बा त मृत्यु पर के आपन जोर चला पाई ?-

-शुभेन्द्र सत्यदेव

 

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