उनकर आह
छन छन छनके
आहट सुन के मन गचके
जाने कवन राहे अहिये
इहे सोच के मन खटके।
आदत अइसन उनकर भइल
बिना सोचे मन तरसे
नासा केतना नसीला होला
देख के उनके अइसन सूझे।
अंग अंग के अइसन रचना
लागे फुरसत में रहले राम
तनिको हमनियो पs रहित धयान
लिहती हजार नैना हथिया।
कारी कजरा मदहोस बा कइले
चाल त बा पागल बनवले
हाथ के मेहदी के करामत सुनS
सुनरता पs बा चार चान लगवले।
कमर कमानी पातर छितर
चिकन बा चाम हो
माछी बइठत छिछ्लत जाले
काबू में ना होला ओकर देह हो।
माई बाप के धन्यबाद करS
अईसन जन्मवले चान हो
देख के अखिया टकटकी लगावे
छोड़ जाला देह के साथ हो।
गजब के गोराई देख के
अंग अंग होजाला छितराय हो
बनठन के निकलेली अइसे
पगला जाले नैना हाजार हो।
पायल छनके चूड़ी खनके
ओठ के लाली मंद मुस्कान
जाने कइसन किस्मत होखी ओकर
जेकर जिनगी होखी बाहार।
घर गमकी मन बहकी
जईबू जेकर अगना हो
केतान्न के मन तरस गइल
आस बा लागल एनहू हो।
इहों पढ़ीं“जाना” (मजदूर के गाथा) कविता प्रिंस रितुराज दुबे
प्रिंस रितुराज दुबे जी के परिचय
भोजपुरिया माटी-पानी में पनपल एगो नवहा जेकरा अपना भाखा भोजपुरी से आ संस्कृति में अटूट विश्वास आ लगाव बा। ‘प्रिंस रितुराज’ के परिचय इंहा एगो अइसन कवि आ निठाह भोजपुरिया जेकर कलम आ लेखनी जन सरोकार के बात करेला