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भोजपुरी संगम के 158 वीं ‘बइठकी’ के भइल सफल आयोजन 

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गोरखपुर। ‘भोजपुरी संगम’ के 158 वीं ‘बइठकी’ कृष्णा नगर कालोनी, गोरखपुर में रवीन्द्र मोहन त्रिपाठी जी के आवास पs रमेश तिवारी के अध्यक्षता आ अवधेश शर्मा ‘नन्द’ के संचालन में दु सत्रन में संपन्न भइल।

कार्यक्रम के पहिला सत्र में राम समुझ ‘साँवरा’ अपना प्रतिनिधि रचनन के पाठ कइलें आ उनका कवितन के समीक्षा कइल गइल।

कार्यक्रम के आरंभ कुमार अभिनीत द्वारा पढ़ल गइल डॉ.राम कृपाल राय के समीक्षा से भइल जेमे राम समुझ ‘सांँवरा’ के माटी से जुड़ल कवि बतावत कहल गइल कि इनकर रचना सहजता से आम जन जीवन के गँवई संस्कृति के रेखांकित करेला।

शशि बिंदु नारायण मिश्र बतवलें कि साँवरा जी के कवितन में अतीत के विलुप्त हो रहल रीति रिवाजन के चित्र दखे के मिलेला आ इहां के रचना भोजपुरी के खाँटी शब्दन से समृद्ध बा।

डॉ.फूलचंद प्रसाद गुप्त साँवरा जी के लोक कवि बतावत उनका रचना संसार के सराहना कइलें। इहो कहलें कि रचनन में अपना समय के उल्लेख जरुर होखें के चाहीं।

अध्यक्षता कर रहल रमेश तिवारी भोजपुरी के सम्प्रेषणीयता आ समृद्धि के चरचा करत साँवरा जी के रचनन के सहज आ हृदय के छुवे वाला बतवलें।

बइठकी के दुसरका ‘कवितई’ सत्र के सुरुआत डॉ.फूलचंद प्रसाद गुप्त द्वारा पढ़ल गइल वाणी वंदना से भइल-

तुहसे निहोरा मइया चरनि में बसाईं,

अपने सरन राखीं मति बिसराईं

डाॅ.अजय ‘अन्जान’ के चइता के सराहना मिलल-

बगिया में बोलेले‌ कोइलिया हो रामा, चइत महिनवा अबकी महुआ कोचियाइल हो रामा, चइत महिनवा

राम सुधार सिंह सैंथवार जिनगी के मर्म के प्रस्तुत कइलें-

तेवना आ पेवना में बितलि जात जिनगी,

का हो राम कब्बो देखब कि नाइ पुनुगी

वीरेंद्र मिश्र ‘दीपक’ तेवरी पढ़लें-

झूठ फइलावऽ जिनि, साँच के सतावऽ जिनि,

कुरसी खातिर केहुए के, अब गरियावऽ जिनि

सुधीर श्रीवास्तव ‘नीरज’ के चइता के सुन्दर प्रस्तुति सभे के आनंदित कइल-

खनकेला कर के कँगनवा हो रामा, चइत महिनवा

मन नाहीं लागे अँगनवा हो रामा, चइत महिनवा

अरविंद ‘अकेला’ के पंक्ति संदेशपरक रहे-

मितऊ मीत से यारी रखिहऽ,

दुःख में भागीदारी रखिहऽ,

मन में तूँ खुद्दारी रखिहऽ,

सजा के रिस्तेदारी रखिहऽ

अवधेश शर्मा ‘नन्द’ के छंद आकर्षित कइलस –

परसान होखऽ नहिं कांट लखे मन से कहिं फूल कऽ ओधी लगावऽ,

कबहूं न अन्हार बिगाड़ि सकी बिनु स्वारथ के जग दीआ जरावऽ।

कुमार अभिनीत ने जीवन के सार समझवलें-

जिनगी के सार बूझऽ, आपन हमार बूझऽ

सबके बा एक्के कहानी हो,

अइसे चलेले जिन्दगानी हो

डॉ.फूलचन्द प्रसाद गुप्त के दोहा सराहल गइल-

जिनगी लागे फूल जस, निकसि खिलत मुरझात।

फिर डारी से टूटि के, धूरी में मिला जात।।

देवरिया से पधारल नरसिंह तिवारी अपना रचना से भोजपुरी के आवाज के बुलंद कइलें-

हरदम ई आबाद रहल बा, हरदम ई आबाद रही,

हम रहब भा ना रहब, भोजपुरी जिन्दाबाद रही

वागेशवरी मिश्र ‘वागीश’ जिनगी के उत्तरार्ध के चित्र देखवलें-

ढकेल देहली दरिया परोस के दुआरी,

बुढ़वा ससुर के सुनावे लगली गारी

एह लोगन के अलावे नील कमल गुप्त ‘विक्षिप्त’ आ आउर रचनाकार लोग अपना भोजपुरी रचनन से ‘बइठकी’ के समृद्ध कइल।

एह मवका पs रवीन्द्र मोहन त्रिपाठी, राम कृष्ण शरण मणि त्रिपाठी, अनुप्रिया आ आउर साहित्य सुधी लोगन के सक्रिय उपस्थिति रहल।

संयोजक कुमार अभिनीत अगिला महीना होखे वाला ‘बइठकी’ के रुपरेखा बतवलें। आभार ज्ञापन धर्मेन्द्र त्रिपाठी कइलें।

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