Lucknow : सत्यार्थ अनिरुद्ध पंकज के पहिला काव्य संग्रह ‘आमुख’ के भइल लोकार्पण, परंपरा में नया अर्थ के तलाश बा कविता के ताकत

By Gaurav Mani Tripathi

Published on: Oct 25, 2026

लखनऊ। 24 अक्टूबर के लखनऊ के इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान के प्लूटो प्रेक्षागृह में वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी आ कवि सत्यार्थ अनिरुद्ध पंकज के पहिला काव्य संग्रह ‘आमुख’ के लोकार्पण भइल। एह मौका पर हिंदी साहित्य के

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लखनऊ। 24 अक्टूबर के लखनऊ के इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान के प्लूटो प्रेक्षागृह में वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी आ कवि सत्यार्थ अनिरुद्ध पंकज के पहिला काव्य संग्रह ‘आमुख’ के लोकार्पण भइल। एह मौका पर हिंदी साहित्य के कई प्रतिष्ठित कवि, आलोचक, कहानीकार आ साहित्यकार मौजूद रहलें। कार्यक्रम में संग्रह के कविता, ओकर संवेदना, सांस्कृतिक स्मृति आ आधुनिक जीवन के जटिलता पर विस्तार से चर्चा भइल।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि आ प्रतिष्ठित हिंदी कवि अरुण कमल कहलें कि बढ़िया कवि ऊ होला जे अपना कविता में पहिले के कवियन के कहल बात के खाली दोहराव ना करे। सत्यार्थ अनिरुद्ध पंकज एह कसौटी पर काफी हद तक सफल नजर आवत बाड़ें। घर, पिता, माई आ परिवार जइसन विषय पर पहिले भी बहुत कविता लिखल गइल बा, बाकिर सत्यार्थ के कविता एह विषय सभ में नया अर्थ आ नया बिंब भरत बाड़ी स।

अरुण कमल कहनी कि जीवन के एगो बड़ चुनौती अधूरापन से मुक्ति पावल ह। सत्यार्थ के कविता जीवन, स्मृति, संबंध आ अधूरापन के स्वीकार करत घरी भी पूर्णता के कामना करेली। एह कविता सभ के पढ़त घरी भर्तृहरि, कबीर, सूरदास, गालिब आ फैज जइसन कवियन के याद जाग उठेला। एह संग्रह में परंपरा के गहिर ज्ञान के साथे इंद्रियबोधो के अनुभव बा। ऊ आगे जोड़लें कि एह कविता सभ में बौद्ध आ शिव दर्शन के आहट भी सुनाई पड़ेला।

कविता के संवेदना आ भाषा के संकट पर उठल सवाल

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के पूर्व विभागाध्यक्ष, यूपीएससी के पूर्व सदस्य आ वरिष्ठ हिंदी आलोचक प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल अध्यक्षीय वक्तव्य देत कहनी कि इतालवी लेखक इटालो काल्विनो के विचार के मुताबिक, इक्कीसवीं सदी के एगो बड़ संकट ई बा कि हमनी के भाषा के एगो भयानक प्रेत काट लिहले बा। आज के दुनिया में दोसरा के दुख के प्रति असहिष्णुता बढ़ रहल बा। अइसन समय में सत्यार्थ के कविता लोग के संवेदनशील बनावे के कोशिश करेली।

प्रो. अग्रवाल कहलें कि आज के दौर में कविता आ चुटकुला, दुनो के अर्थ कमजोर पड़त लउकत बा। एह स्थिति में कवियन के जिम्मेदारी अउरी बढ़ गइल बा। समाज आ जीवन में जटिलता बढ़ रहल बा, एहसे कविता के जटिलता के पढ़े आ समझे के अभ्यास जरूरी बा। अइसने अभ्यास से नया दृष्टि विकसित हो सकेला। उनका मुताबिक, ‘आमुख’ में सांस्कृतिक स्मृति आ मिथकीय स्मृति से रचल कई गो कविता शामिल बाड़ी स।

‘लौटना’ आ ‘स्मृति’ संग्रह के खास ताकत

प्रसिद्ध कहानीकार आ प्रतिष्ठित पत्रिका ‘तद्भव’ के संपादक अखिलेश कहलें कि बढ़िया किताब के सबसे बड़ ताकत ई होला कि ओकर एकही कविता से अलग-अलग पाठक अलग-अलग अर्थ निकाल सकेलें। कवि पाठक के ओह चीज के भी दर्शन करावेला, जे ऊ पहिले देखले बा, आ ओह चीज के भी, जे ओकर नजर से अबले ओझल रहल बा। सत्यार्थ एह काम के बढ़िया तरीका से कइले बाड़ें।

अखिलेश के मुताबिक, ‘लौटना’ एह संग्रह के केंद्र आ नाभिक ह। एहमें लौटे के कई तरह के अर्थ खुलत बा। आधुनिकता के विडंबना, विकास के संकट आ बदलत जीवन के सवाल एह कविता सभ में उभर के सामने आवत बा। ऊ ‘स्मृति’ के एह संग्रह के खास ताकत बतवलें।

कविता में लंबा रियाज आ गहिर अर्थ

कवयित्री आ नाटककार सुमन केशरी कहली कि सत्यार्थ के कविता पढ़ के अइसन लागेला, जइसे ई रचना लंबा रियाज के बाद सामने आइल होखे। एह कविता सभ के अर्थ के गहराई दूर तक ले जाला। ‘अधूरा दर्शन’ कविता के व्याख्या करत ऊ बतवली कि एहमें अनेकार्थकता बा। एकही कविता से लगातार नया-नया अर्थ निकलत रहेला आ पाठक के सोच के नया दिशा मिलेला।

प्रो. अनिल त्रिपाठी कहलें कि ‘आमुख’ सत्यार्थ के पहिला काव्य संग्रह जरूर बा, बाकिर एकर कविता में परिपक्व कवि के अनुभव साफ झलकेला। ऊ ‘कपूर’ कविता के संग्रह के बीज कविता मानलें। उनका विचार से ई कविता एह बात के मजबूत करेली कि सृजन खातिर रचनाकार के अपना अस्तित्व तक के गलावे आ समर्पित करे के पड़ेला।

पिता के स्मृति के समर्पित बा ‘आमुख’

कार्यक्रम के दौरान कवि सत्यार्थ अनिरुद्ध पंकज अपना संग्रह के शीर्षक कविता ‘आमुख’ के पाठ कइलें। ऊ बतवलें कि ‘आमुख’ शब्द के संबंध साहित्यिक परंपरा से जुड़ल बा। भरतमुनि के ‘नाट्यशास्त्र’ में एह शब्द के प्रयोग मिलेला। एकर एगो अर्थ ई भी बा कि कवनो सूत्र के सहारा लेके नाटक के यात्रा शुरू कइल जाला आ ओकर आनंद लिहल जाला।

सत्यार्थ बतवलें कि ‘आमुख’ अपना पिता के स्मृति के समर्पित बा। एह तरह से ई संग्रह खाली कविता के किताब ना, बलुक पारिवारिक संबंध, स्मृति, जीवन-दर्शन आ मानवीय संवेदना के अभिव्यक्ति बनके सामने आवत बा।

लखनऊ में भइल एह लोकार्पण समारोह में साहित्यकारन के विचार से साफ भइल कि ‘आमुख’ परंपरा आ आधुनिकता के बीच संवाद कायम करे वाला काव्य संग्रह ह। एकर कविता पाठक के अपना जीवन, संबंध, स्मृति आ अधूरापन पर फेर से विचार करे के प्रेरणा देत बाड़ी स।

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