Purvai Lok Utsav : दू दिन के ‘पुरवाई लोकोत्सव’ के भव्य सुभारंभ, डॉ. राजीव केतन स्मृति लोक कला सम्मान’ से सम्मानित भइलें तपन पटनायक

By Anurag Ranjan

Published on: Feb 21, 2026

गोरखपुर। पुरवाई कला आ राजकीय बौद्ध संग्रहालय, गोरखपुर के ओर से आयोजित दू दिन के ‘पुरवाई लोकोत्सव’ के भव्य सुभारंभ सनिचर के योगिराज गंभीरनाथ प्रेक्षागृह, तारामंडल गोरखपुर में शान-ओ-शौकत के संगे भइल। एह आयोजन में

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Purvai Lokotsav 2026 Gorakhpur Folk Culture Festival

गोरखपुर। पुरवाई कला आ राजकीय बौद्ध संग्रहालय, गोरखपुर के ओर से आयोजित दू दिन के ‘पुरवाई लोकोत्सव’ के भव्य सुभारंभ सनिचर के योगिराज गंभीरनाथ प्रेक्षागृह, तारामंडल गोरखपुर में शान-ओ-शौकत के संगे भइल। एह आयोजन में लोकसंस्कृति के रंग खूब दमकल आ कला-प्रेमियन के बड़ भीड़ उमड़ पड़ल।

लोकोत्सव के पहिला दिन के उद्घाटन सत्र में देस के नामी लोक कलाकारन आ साहित्यकारन के मवजूदगी से कार्यक्रम आउर ऊंचाई पs पहुंच गइल। मालवा से आइल प्रख्यात लोकगायक पद्मश्री कालूराम बामनिया मुख्य अतिथि रहलें। कार्यक्रम के अध्यक्षता साहित्य अकादमी, नई दिल्ली के पूर्व अध्यक्ष पद्मश्री विश्वनाथ प्रसाद तिवारी कइलें। विशिष्ट अतिथि के रूप में झारखंड से आइल सरायकेला शैली के छऊ नृत्य के प्रसिद्ध कलाकार तपन पटनायक, गोरखपुर विश्वविद्यालय के पूर्व वरिष्ठ आचार्य प्रो. शिव शरण दास आ एसबीआई के उप महाप्रबंधक कुमार आनंद मंच पs मवजूद रहलें।

उद्घाटन सत्र के बाद ‘डॉ. राजीव केतन स्मृति लोक कला सम्मान’ से छऊ नृत्य खातिर राष्ट्रीय पहचान बना चुकल कलाकार तपन पटनायक के सम्मानित कइल गइल। सम्मान स्वीकार करत घरी ऊ कहलें कि लोकनृत्य परंपरा के नया पीढ़ी तक पहुंचावल हमनी सभे के जिम्मेदारी हs। अध्यक्षीय भाषण में पद्मश्री विश्वनाथ प्रसाद तिवारी कहलें कि लोककला भारतीय समाज के आत्मा हs, जवन समय के साथ बदलत रहेला, बाकिर आपन जड़ से जुड़ल रहेला।

कार्यक्रम के दूसरका सत्र संस्कृति के लोकप्रवाह विषय पs केंद्रित रहल। एह दौरान लोकनृत्यन के सानदार प्रस्तुति भइल, जहां संस्कृति विभाग के तीन टीम पारंपरिक वेश-भूषा आ रंग-बिरंगा अंदाज में लोकजीवन के झलक देखवलस। सोनभद्र के कलाकार करमा नृत्य पेश कइल लोग। एकरा बाद आयोजित लोक-विमर्श सत्र में ‘लोक कला के नायक, रंगन से सृष्टि तक’ विषय पs गहिराह विचार-विमर्श भइल। एह सत्र में पद्मश्री कालूराम बामनिया, तपन पटनायक सहित आउर अतिथि लोककला के सामाजिक सरोकार, परंपरा आ आज के चुनौती पṣ आपन बात रखलें।

लोक-विमर्श में पद्मश्री विश्वनाथ प्रसाद तिवारी कहलें कि लोककला कवनो इलाका में बंधल चीज नइखे, बलुक समाज के सामूहिक स्मृति आ संवेदना के जिंदा धारा हs। पद्मश्री कालूराम बामनिया बतवलें कि लोकगायन खाली मनोरंजन ना, बलुक जनता के पीड़ा, संघर्ष आ आध्यात्मिक चेतना के आवाज हs। ओहिजा, तपन पटनायक छऊ नृत्य के परंपरा पs बोलत कहलें कि लोकनृत्य देह आ आत्मा के संतुलन के साधना हs आ एकरा संरक्षण खातिर प्रशिक्षण आ शोध जरूरी बा।

सांझ के लोकगीत आ भाव-नृत्य के प्रस्तुति में अमित अंजन आ उनकर समूह लोकधुन से माहौल रसपूर्ण बना देलस। अंतिम चरण में पद्मश्री कालूराम बामनिया के कबीरवाणी आ तपन पटनायक के सरायकेला शैली के छऊ नृत्य दर्शकन के मन मोह लिहल।

पहिला दिन के पूरा आयोजन लोकसंस्कृति के विविधता आ जीवंतता के सानदार प्रदर्शन रहे। आयोजन समिति के मोताबिक, लोकोत्सव के मकसद भारतीय लोक परंपरा के मजबूत मंच दिहल आ नया पीढ़ी के आपन सांस्कृतिक जड़ से जोड़ल हs।

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