महेंद्र मिसिर: पुरबी के पुरोधा, भोजपुरी लोकसंगीत के अमर सितारा

By Gaurav Mani Tripathi

Published on: Oct 26, 2026

भोजपुरी समाज के पहचान ओकर गीत-संगीत, लोकपरंपरा आ सांस्कृतिक विरासत से बनल बा। इहाँ गीत खाली मनोरंजन के साधन ना ह, बलुक प्रेम, विरह, संघर्ष, सामाजिक जीवन आ सामूहिक स्मृति के अभिव्यक्ति भी हवे। भोजपुरी

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भोजपुरी समाज के पहचान ओकर गीत-संगीत, लोकपरंपरा आ सांस्कृतिक विरासत से बनल बा। इहाँ गीत खाली मनोरंजन के साधन ना ह, बलुक प्रेम, विरह, संघर्ष, सामाजिक जीवन आ सामूहिक स्मृति के अभिव्यक्ति भी हवे। भोजपुरी लोकसंगीत के एह समृद्ध परंपरा में महेंद्र मिसिर के नाम बहुत आदर से लिहल जाला। ऊ अइसन रचनाकार रहलें, जिनकर गीत गाँव के चौपाल से लेके संगीत के बड़-बड़ महफिलन तक गूंजत रहल। उनकर लोकप्रियता एतना व्यापक रहे कि जीवनकाल में ही उनकरा नाम से कई गो कहानी आ किंवदंती जुड़ गइल रहे।

‘पुरबी सम्राट’ आ ‘पुरबी के पुरोधा’ के नाम से मशहूर महेंद्र मिसिर गीतकार, कवि, संगीतज्ञ आ लोकजीवन के संवेदनशील चितेरा रहलें। उनकर रचनन में प्रेम, बिछोह, भक्ति, सामाजिक संबंध आ ग्रामीण जीवन के सजीव चित्रण मिलेला। हालांकि, उनकर जन्म आ निधन के तारीख के लेके अलग-अलग मत मिलेला। एह मतभेद के समझल उनकर जीवन आ साहित्यिक विरासत के सही मूल्यांकन खातिर जरूरी बा।

मिश्रवलिया के माटी से निकलल भोजपुरी के सितारा

महेंद्र मिसिर के जन्म बिहार के सारण जिला के जलालपुर प्रखंड के काहीं मिश्रवलिया गाँव में भइल रहे। उनकर पिता के नाम शिवशंकर मिश्र बतावल जाला, जे छोट जमींदार रहलें। माई के नाम गायत्री देवी मिलेला।

उनकर जन्मतिथि के बारे में अलग-अलग साहित्यिक स्रोत में अलग-अलग जानकारी मिलेला। कहीं 16 मार्च 1886, त कहीं 16 मार्च 1888 के उल्लेख बा। कुछ पुरान स्रोत में 16 मार्च 1876 आ 1865 के तारीख भी बतावल गइल बा। एहसे उनकर सही जन्मतिथि के लेके अबहियों एकमत नइखे।

एह तारीखन के विवाद से अलग, ए बात महत्वपूर्ण बा कि महेंद्र मिसिर सीमित औपचारिक शिक्षा के बावजूद साहित्य आ संगीत के दुनिया में आपन खास पहचान बनवलें। उनकर प्रतिभा के असली आधार लोकजीवन के गहिर समझ आ रचनात्मक क्षमता रहे।

पढ़ाई सीमित, बाकिर भाषा आ साहित्य के गहिर ज्ञान

महेंद्र मिसिर के नियमित स्कूली शिक्षा बहुत सीमित रहे, बाकिर उनकर साहित्यिक रुचि आ बौद्धिक क्षमता असाधारण रहे। उनकर जीवन-वृत्तांत में संस्कृत, हिंदी, उर्दू, बांग्ला, अंग्रेजी आ भोजपुरी समेत कई भाषा के जानकारी के उल्लेख मिलेला। कुछ विवरण में फारसी, अवधी आ ब्रजभाषा से परिचित होखे के बात भी कहल गइल बा।

गाँव के संस्कृत विद्वान नंदू मिसिर से ऊ अभिज्ञान शाकुंतलम् के अध्ययन कइले रहलें। भोजपुरी से अलग भाषा में रचना करत घरी ऊ ‘द्विज महेंद्र’ नाम के इस्तेमाल करत रहलें।

कहल जाला कि ऊ कुछे मिनट में गीत रच देत रहलें। उनकर गीतन में किताबी भाषा के जटिलता से अधिक लोकजीवन के सहज शब्द, मुहावरा आ भावना के महत्व रहे। गाँव के लोग, मौसम, पारिवारिक संबंध आ स्त्री-पुरुष के मन के बात के ऊ नजदीक से समझत रहलें। एही कारण उनकर गीत आम लोग के दिल तक पहुँचत रहल।

पहलवानी, घुड़सवारी आ संगीत के अनोखा मेल

महेंद्र मिसिर के व्यक्तित्व खाली साहित्य तक सीमित ना रहे। उनकर जीवन से जुड़ल विवरण में पहलवानी, घुड़सवारी आ लाठी चलावे के दक्षता के भी चर्चा मिलेला। ऊ मजबूत शरीर, आकर्षक पहनावा, गले में सोना के सिकड़ी आ पान के गिलौरी के चलते अलग पहचान रखत रहलें।

संगीत में उनकर रुचि आ ज्ञान बहुत व्यापक रहे। हारमोनियम, तबला, पखावज, ढोलक, झाल, तानपुरा, सारंगी आ बाँसुरी जइसन वाद्ययंत्रन से उनकर परिचय बतावल जाला।

पुरबी के अलावा निर्गुण, कजरी, दादरा, ठुमरी, टप्पा, खेमटा, गजल आ ऋतुगीत जइसन गायन शैली से भी उनकर जुड़ाव रहल। एह विविधता से उनकर रचनात्मक दुनिया अउरी समृद्ध भइल।

पुरबी गायकी के दिहल खास पहचान

महेंद्र मिसिर के सबसे बड़ योगदान भोजपुरी के पुरबी गायकी के लोकप्रिय बनावल मानल जाला। पुरबी में प्रेम, प्रतीक्षा, विरह आ बिछोह के भावना बहुत मार्मिक ढंग से व्यक्त होला। महेंद्र मिसिर एह भावना के अइसन सहज भाषा दिहलें, जे सीधा श्रोता के मन छू लेत रहे।

उनकर गीतन में परदेश गइल पिया के इंतजार करत मेहरारू के पीड़ा, प्रियजन से बिछुड़े के दुख, पारिवारिक संबंधन के तनाव आ स्त्री मन के संवेदना बार-बार सामने आवेला।

‘अंगुरी में डंसले बिया नगिनिया’, ‘ए ननदी, दिया जरा दे’, ‘सासु मोरा मारे रामा बांस के छिउंकिया’, ‘सुसुकति पनिया के जाय’, ‘आधी-आधी रतिया के पिहके पपीहरा’ आ ‘मोरे अंखिया के निनिया बैरनिया भइली ना’ जइसन गीत उनकर लोकप्रिय गीत-परंपरा में याद कइल जालें। ‘पिया मोरे गईले सखी पुरबी बनिजिया’ में परदेश गइल प्रिय के इंतजार आ मन के बेचैनी के भाव देखे के मिलेला।

उनकर गीतन के खासियत ई रहे कि ओहमें स्त्री के मन के बात के पूरा जगह मिलत रहे। अइसन भावनन के आवाज मिलल, जेकरा के सामाजिक जीवन में कई बेर खुलके कहे के मौका ना मिलत रहे।

संगीत के महफिलन से लोकसमाज तक पहुँचली रचना

महेंद्र मिसिर के गीत खाली गाँव आ जिला तक सीमित ना रहलें। पटना से कलकत्ता आ बनारस से मुजफ्फरपुर तक के संगीत महफिलन में उनकर रचनन के चर्चा होत रहे। ओह समय के गायिका आ नृत्यांगना भी उनकर गीत गावत रहली।

तत्कालीन संगीत महफिल सांस्कृतिक आदान-प्रदान के महत्वपूर्ण केंद्र रहल। एही माध्यम से गीत अलग-अलग इलाका में पहुँचत रहलें आ लोकप्रियता हासिल करत रहलें।

भोजपुरी समाज के लोग जब रोजगार आ दोसरा कारण से मॉरीशस, फिजी, सूरीनाम, त्रिनिदाद आ नीदरलैंड जइसन देश में गइल, त भोजपुरी भाषा आ लोकगीत के परंपरा भी ओहिजा पहुँचल। एह व्यापक सांस्कृतिक विरासत के संदर्भ में महेंद्र मिसिर के गीतन के महत्व समझल जा सकेला।

ढेलाबाई से जुड़ल प्रेम आ जीवन के जटिल प्रसंग

महेंद्र मिसिर के जीवन-कथा में ढेलाबाई के नाम भी खास तौर पर आवेला। कुछ विवरण के अनुसार, ढेलाबाई के मूल नाम गुलजारी बाई रहे आ ऊ चर्चित गायिका-नृत्यांगना मीना बाई के बेटी रहली।

महेंद्र मिसिर आ ढेलाबाई के संबंधन के चर्चा कई उपन्यास आ साहित्यिक रचनन में भइल बा। कुछ लोकप्रिय जीवनियन में जमींदार हलिवंत सहाय आ ढेलाबाई से जुड़ल विवादास्पद घटनन के वर्णन भी मिलेला।

बाकिर एह प्रसंगन के समझत घरी ई ध्यान में रखल जरूरी बा कि उपन्यास में ऐतिहासिक तथ्य के साथ साहित्यिक कल्पना भी हो सकेले। एहसे हर घटना के प्रमाणित इतिहास माने से पहिले स्वतंत्र स्रोत के जाँच जरूरी बा।

फेर भी प्रेम, बिछोह, असुरक्षा आ स्त्री के विवशता जइसन भाव महेंद्र मिसिर के गीतन में प्रमुखता से देखे के मिलेला।

आजादी के लड़ाई आ जाली नोट के चर्चित कहानी

महेंद्र मिसिर के जीवन से जुड़ल एगो अउरी चर्चित प्रसंग अंग्रेजी शासन के खिलाफ कथित गतिविधियन से संबंधित बा। प्रचलित जीवन-वृत्तांत में कहल जाला कि ऊ क्रांतिकारियन के मदद करे खातिर जाली नोट छापे के काम कइले रहलें।

कुछ कहानी में नेताजी सुभाष चंद्र बोस के भाषण सुने के बाद उनकरा पर पड़ल प्रभाव के चर्चा बा। एह विवरण के अनुसार, ऊ नोट छापे के मशीन मँगववलें आ छपल नोट के इस्तेमाल स्वतंत्रता सेनानियन के मदद खातिर कइल जात रहे।

प्रचलित विवरण में कहल जाला कि 16 अप्रैल 1924 के रात उनकर घर पर छापा पड़ल आ नोट छापे के मशीन समेत कई सामान बरामद भइल। एकरा बाद मुकदमा चलल आ दस साल के सजा सुनावल गइल। उनकर जेल यात्रा के बक्सर जेल से जोड़ल जाला।

हालांकि, एह घटना के तारीख, मुकदमा, सजा आ रिहाई से जुड़ल सब तथ्य के पुष्टि खातिर स्वतंत्र ऐतिहासिक दस्तावेज आ न्यायालय के अभिलेख जरूरी बा। एहसे एह कहानी के प्रचलित जीवन-वृत्तांत के रूप में देखल उचित होई।

अंग्रेजी शासन पर व्यंग्य करत गीत

महेंद्र मिसिर के नाम से प्रचलित कुछ गीत अंग्रेजी शासन के आर्थिक शोषण पर कटाक्ष करेलें। एगो गीत में कहल गइल बा—

“हमरा नीको ना लागे गोरन के करनी,

रुपया ले गइल, पइसा ले गइल,

अउरी ले गइल सब गिन्नी।

बदला में देके गइल ढल्ली के दुअन्नी,

हमरा नीको ना लागे गोरन के करनी।”

एह पंक्तियन में अंग्रेजी शासन के आर्थिक नीति आ भारतीय लोग के संपत्ति के दोहन के खिलाफ नाराजगी झलकेला। लोकभाषा के गीत के माध्यम से राजनीतिक विरोध जतावे के ई एगो महत्वपूर्ण उदाहरण ह।

‘अपूर्व रामायण’ आ साहित्यिक योगदान

महेंद्र मिसिर के साहित्यिक उपलब्धियन में ‘अपूर्व रामायण’ के खास महत्व बतावल जाला। कुछ साहित्यिक विवरण में एकरा भोजपुरी के पहिल महाकाव्य कहल गइल बा। लोकप्रिय जीवनियन के अनुसार, एह कृति के रचना ऊ जेल में रहत कइले रहलें आ एकरा सात खंड में बाँटल गइल बा।

उनकरा से जुड़ल अन्य कृतियन में ‘महेंद्र मंजरी’, ‘महेंद्र विनोद’, ‘महेंद्र मयंक’, ‘भीष्म प्रतिज्ञा’, ‘कृष्ण गीतावली’, ‘महेंद्र प्रभाकर’, ‘महेंद्र रत्नावली’, ‘महेंद्र चंद्रिका’ आ ‘महेंद्र कवितावली’ के नाम मिलेला।

उनकर साहित्य के पूरा सूची, अलग-अलग संस्करण आ रचनन के विधा के व्यवस्थित अध्ययन के जरूरत बा, ताकि भोजपुरी साहित्य में उनकर योगदान के प्रामाणिक रूप से सामने रखल जा सके।

महेंद्र मिसिर पर लिखल गइल कई गो साहित्यिक कृति

महेंद्र मिसिर के जीवन आ व्यक्तित्व साहित्यकारन के हमेशा आकर्षित कइले बा। भोजपुरी में पांडेय कपिल के फुलसुंघी (1977), रामनाथ पांडेय के महेंद्र मिसिर (1994) आ जौहर शफियाबादी के पूर्वी के धाह (2010) उल्लेखनीय कृति हईं।

हिंदी साहित्य में अनामिका के दस द्वारे का पींजरा (2008) आ संजीव के पुरबी बयार (2021) के चर्चा भी एह संदर्भ में होला। रवींद्र भारती के नाटक कंपनी उस्ताद आ जगन्नाथ मिश्र के पुरबी के पुरोधा भी एह साहित्यिक परंपरा से जुड़ल कृति हईं।

बाकिर उपन्यास आ ऐतिहासिक जीवनी में अंतर समझल जरूरी बा। उपन्यास में कल्पना के स्वतंत्रता होला, जबकि जीवनी में प्रमाण आ तथ्य के विशेष महत्व होला।

जन्म आ निधन के तारीख पर अबहियों मतभेद

महेंद्र मिसिर के जीवन पर कई गो रचना उपलब्ध होखला के बावजूद उनकर प्रमाण-आधारित जीवनी के जरूरत बनल बा। उनकर जन्मतिथि के संबंध में 1865, 1876, 1886 आ 1888 के उल्लेख मिलेला।

उनकर निधन के तारीख के लेके भी मतभेद बा। कुछ लोकप्रिय जीवन-वृत्तांत में 26 अक्टूबर 1946, जबकि डॉ. प्रमोद कुमार तिवारी से जुड़ल विवरण में 28 सितंबर 1946 के तारीख दिहल गइल बा।

एह मतभेद के दूर करे खातिर पुरान समाचारपत्र, पारिवारिक दस्तावेज, स्थानीय अभिलेख आ साहित्यिक पत्रिकन के जाँच जरूरी बा।

डॉ. सुरेश कुमार मिश्र के संपादन में प्रकाशित महेंद्र मिसिर के गीत संसार के 2002 आ 2012 के संस्करण उनकर गीतन के संकलन आ संरक्षण के दिशा में महत्वपूर्ण काम मानल जालें।

आजुओ प्रासंगिक बा महेंद्र मिसिर के विरासत

महेंद्र मिसिर के सबसे बड़ ताकत उनकर गीतन के सहजता आ भावनात्मक गहराई ह। प्रेम, विरह, परदेश गइल पिया के इंतजार आ पारिवारिक संबंधन के संवेदना आजुओ लोग के मन छू लेला।

उनकर विरासत के बचावे खातिर खाली जयंती आ पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि देहल पर्याप्त नइखे। उनकर गीतन के प्रमाणित संकलन, पुरान गायकी के रिकॉर्डिंग के संरक्षण, नया कलाकारन के प्रोत्साहन आ भोजपुरी साहित्य पर शोध के बढ़ावा देहल भी जरूरी बा।

डिजिटल माध्यम से उनकर गीतन के सही बोल, ऐतिहासिक संदर्भ आ अलग-अलग गायन शैली के साथ नई पीढ़ी तक पहुँचावल जा सकेला।

महेंद्र मिसिर के जीवन से जुड़ल कई गो कहानी के ऐतिहासिक पुष्टि अबहियों बाकी हो सकेला, बाकिर भोजपुरी लोकसंगीत में उनकर योगदान के महत्व बहुत व्यापक बा। ऊ पुरबी गायकी के लोकप्रिय पहचान दिहलें आ लोकजीवन के सुख-दुख, प्रेम आ विरह के अइसन स्वर दिहलें, जे पीढ़ी दर पीढ़ी गूंजत रहल।

महेंद्र मिसिर के सच्चा सम्मान ईहे बा कि उनकर गीतन के सहेजल जाव, उनकर जीवन पर प्रमाण-आधारित शोध होखे आ भोजपुरी के एह अनमोल सांस्कृतिक विरासत के अगिला पीढ़ी तक पहुँचावल जाव।

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