Chaitra navratri 2025 : एs बेर केतना दिन के होई चैत्र नवरात्रि, जानीं एजु

By Anurag Ranjan

Published on: Mar 11, 2025

चैत्र नवरात्रि के पर्व एह साल 30 मार्च से शुरू हो रहल बा. हिन्दू धर्म में ई परब बड़ा धूमधाम से मनावल जाला। नवरात्रि के पूरा नौ दिन देवी दुर्गा के 9 रूप के विधि-विधान

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चैत्र नवरात्रि

चैत्र नवरात्रि के पर्व एह साल 30 मार्च से शुरू हो रहल बा. हिन्दू धर्म में ई परब बड़ा धूमधाम से मनावल जाला। नवरात्रि के पूरा नौ दिन देवी दुर्गा के 9 रूप के विधि-विधान से पूजा कईल जाला। जानी कि चैत्र महीना के नवरात्रि शुक्ल पक्ष के प्रतिपदा तिथि से शुरू होला. एह दौरान नवरात्रि के व्रत आ पूजा-अर्चना करके माई दुर्गा सब मनोकामना पूरा करेली।तs बता दी अबकी चैत्र नवरात्रि केतना दिन बा आ पूजा विधि आ कलश स्थापना के समय का बा।

चैत्र नवरात्रि केतना दिन बा?

हिन्दू कैलेंडर के हिसाब से एह साल चैत्र नवरात्रि अतवार 30 मार्च से शुरू हो रहल बा आ अतवार 6 अप्रैल के समाप्त हो रहल बा अबकी बेर तिथि में बदलाव के चलते अष्टमी आ नवमी एके दिन पड़ रहल बा। एह से चैत्र नवरात्रि मात्र 8 दिन तक चली। मानल जाला कि एह काल में देवी दुर्गा के नौ रूप के नियमित पूजा कइला से सगरी मनोकामना पूरा हो जाला. 

चैत्र नवरात्रि पूजा विधि

चैत्र नवरात्रि के दिन ब्रह्म मुहूर्त में जाग के नहा के, फेर मंदिर के सफाई करीं। एकरा बाद गंगाजल छिड़क के पूजा स्थल के शुद्ध करीं। एह दौरान माई भगवती के लाल चुनरी आ लाल फूल चढ़ावे के चाहीं।  साथ ही चना आ खीर के सेवन प्रसाद के रूप में होखे के चाहीं। एकरा अलावे घर के मंदिर में धूप अवुरी देसी घी के दीप जरावल जाला।
एकरा बाद दुर्गा सप्तशती आ दुर्गा चालीसा के पाठ करीं आ पूजा के अंत में माता रानी से प्रार्थना करीं आ अपना गलती के माफी मांगीं.

चैत्र नवरात्रि कलश स्थापना मुहूर्त 2025


पहिला मुहूर्त – 30 मार्च 2025 के सुबेरे 06:13 मिनट से सुबेरे 10:22 मिनट ले बा.
दूसरका मुहूर्त – घटस्थापना के अभिजीत मुहूर्त दुपहरिया 12:01 मिनट से 12:50 मिनट ले बा.

1- दुर्गा स्तुति मंत्र

या देवी सर्वभूतेषु मातृरुपेण संस्थितः, या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरुपेण संस्थितः।
या देवी सर्वभूतेषु शान्तिरुपेण संस्थितः, नमस्तस्यैः नमस्तस्यैः नमस्तस्यैः नमो नमः।।
ॐ अम्बायै नमः ।।

2- दुर्गा स्तुति मंत्र

जय भगवति देवी नमो वरदे जय पापविनाशिनि बहुफलदे।
जय शुम्भनिशुम्भकपालधरे प्रणमामि तु देवी नरार्तिहरे॥1॥
जय चन्द्रदिवाकरनेत्रधरे जय पावकभूषितवक्त्रवरे।
जय भैरवदेहनिलीनपरे जय अन्धकदैत्यविशोषकरे॥2॥
जय महिषविमर्दिनि शूलकरे जय लोकसमस्तकपापहरे।
जय देवी पितामहविष्णुनते जय भास्करशक्रशिरोवनते॥3॥
जय षण्मुखसायुधईशनुते जय सागरगामिनि शम्भुनुते।
जय दु:खदरिद्रविनाशकरे जय पुत्रकलत्रविवृद्धिकरे॥4॥
जय देवी समस्तशरीरधरे जय नाकविदर्शिनि दु:खहरे।
जय व्याधिविनाशिनि मोक्ष करे जय वाञ्छितदायिनि सिद्धिवरे॥5॥
एतद्व्यासकृतं स्तोत्रं य: पठेन्नियत: शुचि:।
गृहे वा शुद्धभावेन प्रीता भगवती सदा॥6॥

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