नई दिल्ली। बिहार के संस्कृति उहाँ के लोकगीतन में बसल बा। हालांकि, अक्सर लोग मान लेला कि बिहार में खाली ‘लॉलीपॉप लागेलू’ जइसन गानवे बजेला, बाकिर उहाँ के लोकगीत सुनीं त बिहार के लोक संस्कृति के असली झलक देखे के मिली। अइसने एगो लोकगीत बा—‘निमिया पतईया झरी जाए हो अंगनवा, कईसे बहारु जी।’
ई गीत बिहार के गांव-देहात से जुड़ल बा आ उहाँ के आम जिनगी आ रिश्ता-नाता के बहुत खूबसूरत तरीका से बयान करेला। एह गीत के बिहार के कई गो मशहूर गायक भी आपन आवाज दे चुकल बाड़ें। आईं जानीं कि एह लोकगीत में का कहल गइल बा।
ई लोकगीत का कहेला?
ई लोकगीत एगो मेहरारू के नजरिया से गावल गइल बा, जवना में ओकर घर के जिम्मेदारी आ ससुराल के रिश्ता-नाता के बहुत खूबसूरत तरीका से बतावल गइल बा। एह गीत के शुरुआत नीम के पेड़ से झर रहल पत्तियन आ झाड़ू लगाके ओह पत्तियन के समेटे के मजबूरी से होला। मेहरारू कहत बिया— ‘निमिया पतईया झरी जाय हो अंगनवा, कईसे बहारु जी।’ यानी नीम के पत्तिया झर के पूरा आंगन में पसर गइल बाड़ी स, बाकिर ऊ आंगन के सफाई कइसे करे।
आंगन में ऊ झाड़ू काहे नइखे लगा पावत, एकर कारण मेहरारू गीत में आगे बतावत बिया। एह गीत में परिवार से जुड़ल मेहरारू के बंदिशन के देखावल गइल बा। एह गीत में एगो बहू के अपना ससुराल में मर्यादा आ जिम्मेदारियन के निभावे के कोशिश के बतावल गइल बा।
परिवार के रिश्ता-नाता के मर्यादा
बिहार के गांव-देहात में मेहरारू लोग के पारिवारिक रिश्ता-नाता के बहुत संभाल के निभावे के पड़ेला आ एही बात के एह गीत में आगे बतावल गइल बा। मेहरारू कहत बिया— ‘ओही रे अंगनवा ससुर जी के डेरा, पगड़ी देखत जिया जाय रे अंगनवा, कईसे बहारु जी।’ यानी ओही आंगन में ओकर ससुर रहेलें आ एही वजह से ऊ आंगन में झाड़ू नइखे लगा पावत।
भारतीय संस्कृति में ससुर के पिता के समान मानल जाला, बाकिर कुछ मर्यादा भी होला। ससुर के मौजूदगी से ही बहू के मन में संकोच पैदा हो जाला। एह गीत में भी एही बात के बतावल गइल बा।
भसुर जी के डेरा आ बहू के दूरी
आगे गीत में मेहरारू कहत बिया— ‘ओही रे अंगनवा भसुर जी के डेरा, तनिको छूवत जिया जाय रे अंगनवा, कईसे बहारु जी।’ यानी ओही आंगन में भसुर जी, मतलब पति के बड़ भाई भी रहेलें। बिहार में भसुर के छूअल मर्यादा के खिलाफ मानल जाला। एहसे कहीं गलती से उनकरा हाथ ना छू जाए, एही डर से ऊ आंगन में सफाई करे से कतरा रहल बिया।
पति के डेरा आ अपनापन
ससुराल के एह तमाम रिश्ता-नाता के बीच जब पिया जी यानी पति के बात आवेला, त मेहरारू के एगो अलग भाव देखे के मिलेला। मेहरारू कहत बिया कि ‘ओही रे अंगनवा पिया जी के डेरा, खियान लड़त जिया जाय रे अंगनवा, कईसे बहारु जी।’
जहाँ बाकी रिश्ता में संकोच आ झिझक के भाव रहे, उहाँ पति के साथ नजर मिलेला। नजर के ई मिलन ससुराल में मेहरारू के अपनापन के एहसास करावेला आ ऊ अपना सगरी संकोच भुला देले।
READ MORE: गोरखपुर में बनी उत्तर प्रदेश के पहिला फॉरेस्ट्री आ हॉर्टिकल्चर यूनिवर्सिटी, शिलान्यास के तइयारी तेज
https://khabarbhojpuri.com/gorakhpur-mein-bani-uttar-pradesh-ke-pahila-forestry-aur-horticulture-university-shilanyas-ke-taiyari-tej/







No comments yet. Be the first to comment!