शक्ति के उपासना के महापर्व शारदीय नवरात्र एह साल शुभ संयोग के साथ 11 अक्टूबर, रविवार से शुरू होई। नवरात्र के शुरुआत से पहिले से लेके विजयादशमी तक भक्तन में खास उत्साह देखे के मिली। एह बेर अष्टमी तिथि दू दिन पड़ला के कारण शारदीय नवरात्र 10 दिन के होई। एह वजह से नवरात्र के पूरा पूजा क्रम में भी बदलाव हो गइल बा। खास बात ई बा कि मां महागौरी के पूजा दू दिन—18 आ 19 अक्टूबर—के होई।
शारदीय नवरात्र के पहिला दिन 11 अक्टूबर के चित्रा नक्षत्र, वैधृति योग, द्विपुष्कर योग, बव करण आ तुला लग्न में कलश स्थापना के साथ नवरात्र के शुभारंभ होई। घर-घर में विधि-विधान से कलश स्थापना कइल जाई आ मां दुर्गा के अलग-अलग स्वरूपन के पूजा शुरू होई।
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार नवरात्र के दौरान अगर कवनो तिथि बढ़ जाव त ओकरा के शुभ मानल जाला। एह साल अष्टमी तिथि दू दिन होखे के कारण भक्तन के मां महागौरी के आराधना खातिर एक अतिरिक्त दिन मिली। घर से लेके मंदिर आ पूजा पंडालन तक दस दिन ले मां दुर्गा के विभिन्न स्वरूपन के पूजा-अर्चना होई आ वेदमंत्र के गूंज सुनाई दी।
11 अक्टूबर से शुरू होई नवरात्र
शारदीय नवरात्र के शुरुआत 11 अक्टूबर, रविवार के प्रतिपदा तिथि से होई। एह दिन भक्त कलश स्थापना क के मां शैलपुत्री के पूजा करीहें। नवरात्र के दौरान श्रद्धालु लोग दुर्गा सप्तशती के पाठ के साथ-साथ रामचरितमानस, सुंदरकांड, रामरक्षा स्तोत्र, दुर्गा सहस्रनाम, अर्गला स्तोत्र, कवच, कीलक आ सिद्ध कुंजिका स्तोत्र के पाठ भी करीहें।
धार्मिक मान्यता बा कि श्रद्धा से कइल गइल सप्तशती पाठ से रोग आ शोक से मुक्ति मिलेला। एकरा अलावा सुख-समृद्धि, ज्ञान, वैभव आ परिवार में आपसी सौहार्द के प्राप्ति खातिर भी दुर्गा सप्तशती पाठ के विशेष महत्व बतावल गइल बा।
20 अक्टूबर के नवमी, 21 अक्टूबर के विजयादशमी
ज्योतिषाचार्य लोग के मुताबिक 20 अक्टूबर के सूर्योदय के समय नवमी तिथि विद्यमान रही। एकरा बाद दशमी तिथि के प्रवेश होई। उदया तिथि के मान्यता के आधार पर 21 अक्टूबर के विजयादशमी के पर्व मनावल जाई।
धर्मशास्त्रीय परंपरा में कवनो पर्व के तिथि के निर्धारण खाली कैलेंडर के तारीख देख के ना कइल जाला। सूर्योदय के समय कवन तिथि विद्यमान बा, ओकर व्याप्ति कतना बा आ शास्त्र में ओकरा बारे में का विधान बा—ई सभ बात के ध्यान में रख के पर्व के तारीख तय कइल जाला।
एह कारण से एह साल नवरात्र के अंतिम दिनन के क्रम भी सामान्य साल से कुछ अलग देखे के मिली।
हाथी पर होई मां दुर्गा के आगमन आ विदाई
एह साल मां दुर्गा के आगमन आ विदाई हाथी पर होई। धार्मिक मान्यता के मुताबिक देवी भागवत पुराण में देवी के वाहन के विशेष महत्व बतावल गइल बा। हाथी पर देवी के आगमन आ गमन के शुभ संकेत मानल जाला।
मान्यता बा कि हाथी पर देवी के आगमन से धरती पर सुख-समृद्धि, आर्थिक उन्नति आ अच्छी बरखा के संभावना बढ़ेला। एह वजह से श्रद्धालु लोग एह साल के नवरात्र के विशेष शुभ संयोग वाला मान रहल बा।
दिन के वार से तय होला देवी के वाहन
आचार्य लोग बतावेलन कि देवी भागवत पुराण के अनुसार नवरात्र के पहिला दिन के वार से देवी के आगमन के वाहन आ अंतिम दिन के वार से विदाई के वाहन तय होला।
देवी के आगमन के वाहन के संबंध में मान्यता बा कि—
- रविवार आ सोमवार के आगमन होखे त वाहन गज यानी हाथी होला।
- मंगलवार आ शनिवार के वाहन घोड़ा होला।
- गुरुवार आ शुक्रवार के वाहन डोला मानल जाला।
- बुधवार के देवी के वाहन नौका बतावल गइल बा।
ओही तरह देवी के विदाई के वाहन के बारे में भी अलग-अलग विधान बा—
- रविवार आ सोमवार के विदाई के वाहन महिष होला।
- मंगलवार आ शनिवार के चरणायुध के वाहन मानल जाला।
- बुधवार आ शुक्रवार के गज यानी हाथी होला।
- गुरुवार के विदाई के वाहन नर बतावल गइल बा।
एह साल नवरात्र के शुरुआत रविवार के हो रहल बा, एहसे देवी के आगमन हाथी पर होई।
18 आ 19 अक्टूबर के होई अष्टमी
एह साल के नवरात्र के सबसे खास बात अष्टमी तिथि के दू दिन रहला बा। अष्टमी 18 अक्टूबर आ 19 अक्टूबर दुनु दिन रही। एह कारण से मां महागौरी के पूजा भी दू दिन होई।
18 अक्टूबर के अष्टमी व्रत रखल जाई आ मां महागौरी के विशेष शृंगार आ पूजन कइल जाई। अगिला दिन 19 अक्टूबर के भी अष्टमी तिथि रहे के कारण महागौरी के आराधना जारी रही।
सामान्य रूप से नवरात्र में अष्टमी के दिन मां महागौरी के पूजा के खास महत्व होला। एह दिन भक्त उपवास रख के देवी के पूजा-अर्चना करेलें आ परिवार के सुख-शांति आ समृद्धि खातिर प्रार्थना करेलें।
17 अक्टूबर के सप्तमी, 20 अक्टूबर के महानवमी
नवरात्र के क्रम में 17 अक्टूबर के सप्तमी तिथि रही। एह दिन मां कालरात्रि के पूजा कइल जाई। एकरा बाद 18 आ 19 अक्टूबर के महागौरी के पूजा होई।
20 अक्टूबर, मंगलवार के महानवमी के व्रत आ पूजन होई। एह दिन मां सिद्धिदात्री के आराधना कइल जाई। महानवमी के दिन कन्या पूजन, हवन आ अन्य धार्मिक अनुष्ठान के भी विशेष महत्व होला।
एकरा बाद 21 अक्टूबर के दशमी तिथि पर विजयादशमी के पर्व मनावल जाई। एह दिन बुराई पर अच्छाई के जीत के प्रतीक के रूप में दशहरा मनावल जाला।
नवरात्र में कब होई कवन देवी के पूजा?
एह साल शारदीय नवरात्र के पूरा क्रम एह तरह रही—
| तारीख | तिथि | मां के स्वरूप |
|---|---|---|
| 11 अक्टूबर | प्रतिपदा | मां शैलपुत्री |
| 12 अक्टूबर | द्वितीया | मां ब्रह्मचारिणी |
| 13 अक्टूबर | तृतीया | मां चंद्रघंटा |
| 14 अक्टूबर | चतुर्थी | मां कूष्मांडा |
| 15 अक्टूबर | पंचमी | मां स्कंदमाता |
| 16 अक्टूबर | षष्ठी | मां कात्यायनी |
| 17 अक्टूबर | सप्तमी | मां कालरात्रि |
| 18 अक्टूबर | अष्टमी | मां महागौरी |
| 19 अक्टूबर | अष्टमी | मां महागौरी |
| 20 अक्टूबर | नवमी | मां सिद्धिदात्री |
| 21 अक्टूबर | दशमी | विजयादशमी |
दस दिन तक गूंजेगा मां के जयकारा
अष्टमी तिथि बढ़ला के कारण एह साल शारदीय नवरात्र के अवधि 10 दिन के हो गइल बा। एह दौरान घर, मंदिर आ पूजा पंडालन में मां दुर्गा के विभिन्न स्वरूपन के विधि-विधान से पूजा होई। श्रद्धालु लोग उपवास रखिहें, दुर्गा सप्तशती के पाठ करीहें आ मां के आशीर्वाद खातिर प्रार्थना करीहें।
नवरात्र के ई दस दिन भक्ति, आस्था आ शक्ति उपासना के लिहाज से खास होई। 21 अक्टूबर के विजयादशमी के साथ नवरात्र के समापन होई। एह दिन भक्त मां दुर्गा से सुख, शांति, समृद्धि आ परिवार के मंगल के कामना करीहें।
कुल मिलाके देखल जाव त शारदीय नवरात्र 2026 में अष्टमी तिथि बढ़ला से नवरात्र के क्रम में खास बदलाव भइल बा। 18 आ 19 अक्टूबर के लगातार दू दिन मां महागौरी के पूजा होई आ 21 अक्टूबर के विजयादशमी मनावल जाई। हाथी पर मां दुर्गा के आगमन आ विदाई के धार्मिक मान्यता के चलते एह साल के नवरात्र के शुभ आ विशेष मानल जा रहल बा।







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