हिमाचल प्रदेश के कुल्लू घाटी में मनावल जाए वाला कुल्लू दशहरा भारत के एगो अनोखा धार्मिक आ सांस्कृतिक उत्सव ह। देश के अधिकतर हिस्सा में जब दशहरा के समापन होला, तब कुल्लू में एह पर्व के शुरुआत होला। भगवान रघुनाथ जी के पूजा, सैकड़न देवी-देवता के जुटान, भव्य रथ यात्रा आ हिमाचली लोक संस्कृति एह उत्सव के खास पहचान ह।
कुल्लू दशहरा कब शुरू भइल?
कुल्लू दशहरा हर साल आमतौर पर अक्टूबर महीना में मनावल जाला। ई उत्सव आश्विन महीना के शुक्ल पक्ष के दशमी, यानी विजयादशमी के दिन शुरू होला आ लगभग सात दिन ले चलेला। साल 2026 में अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा के आयोजन 21 से 27 अक्टूबर ले निर्धारित बा। एह दौरान कुल्लू के ऐतिहासिक ढालपुर मैदान श्रद्धालु आ पर्यटकन से भर जाला।
कुल्लू दशहरा के शुरुआत कइसे भइल?
कुल्लू दशहरा के इतिहास सत्रहवीं सदी से जुड़ल बा। मान्यता के अनुसार, कुल्लू के राजा जगत सिंह भगवान रघुनाथ जी के प्रतिमा अयोध्या से मंगववले रहनी। बाद में भगवान रघुनाथ जी के कुल्लू घाटी के प्रमुख आराध्य देवता के रूप में प्रतिष्ठित कइल गइल।
एह परंपरा के चलते गाँव-गाँव के देवी-देवता के भगवान रघुनाथ जी के दर्शन आ सम्मान करे खातिर एक जगह जुटे के परंपरा शुरू भइल। आजो एह परंपरा के पूरा श्रद्धा से निभावल जाला।
कइसे मनावल जाला कुल्लू दशहरा?
कुल्लू दशहरा के शुरुआत देवी हिडिंबा के मनाली से कुल्लू पहुँचे के परंपरा से जुड़ल बा। एकरा बाद भगवान रघुनाथ जी के सुसज्जित लकड़ी के रथ पर विराजमान कइल जाला। श्रद्धालु रस्सी के सहारे रथ खींचेला आ भव्य रथ यात्रा निकालल जाला।
एह उत्सव के सबसे खास दृश्य गाँव-गाँव से आवे वाला देवी-देवता के पालकी ह। स्थानीय लोग अपना देवी-देवता के रंग-बिरंगा पालकी में सजाके ढालपुर मैदान ले आवेला। पारंपरिक वाद्ययंत्र, भजन, लोकगीत आ नृत्य के बीच पूरा इलाका भक्तिमय हो जाला।
सात दिन के एह आयोजन में धार्मिक अनुष्ठान के साथ-साथ सांस्कृतिक कार्यक्रम, लोकनृत्य, हस्तशिल्प के प्रदर्शनी आ मेला के भी आयोजन होला। हिमाचल प्रदेश के प्रसिद्ध नाटी लोकनृत्य एह उत्सव के रौनक बढ़ावेला। देश-विदेश से आवे वाला कलाकार आ पर्यटक एह संस्कृति के नजदीक से देखे के मौका पावेलन।
कुल्लू में रावण के पुतला काहे ना जरावल जाला?
भारत के कई हिस्सा में दशहरा के दिन रावण, कुंभकर्ण आ मेघनाद के पुतला जरावल जाला। बाकिर कुल्लू दशहरा के परंपरा एहसे अलग बा। इहाँ उत्सव के मुख्य केंद्र भगवान रघुनाथ जी के पूजा आ देवी-देवता के सामूहिक जुटान ह, ना कि रावण के पुतला दहन।
उत्सव के आखिरी दिन ब्यास नदी के किनारे लंका दहन से जुड़ल पारंपरिक अनुष्ठान भी कइल जाला। एह तरीका से कुल्लू दशहरा आपन अलग धार्मिक पहचान बनवले रखले बा।
कुल्लू दशहरा के सांस्कृतिक महत्व
कुल्लू दशहरा खाली एगो धार्मिक पर्व ना ह, बलुक हिमाचल प्रदेश के इतिहास, लोकविश्वास आ सामुदायिक एकता के प्रतीक भी ह। ई उत्सव नई पीढ़ी के आपन परंपरा से जोड़े ला आ स्थानीय कला, संगीत आ हस्तशिल्प के बढ़ावा देला।
कुल्लू दशहरा के खासियत ओकर अनोखा आयोजन, भगवान रघुनाथ जी के प्रति श्रद्धा आ सैकड़न देवी-देवता के एक साथ जुटान में बा। एहसे ई उत्सव भारत के समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के एगो महत्वपूर्ण हिस्सा बन गइल बा।






No comments yet. Be the first to comment!