दादा के संपत्ति पर पोता-पोती के हक बा कि ना? कर्नाटक हाई कोर्ट सुनवलस फैसला

By Shweta Supriya

Published on: Oct 8, 2026

डिजिटल डेस्क, बेंगलुरु। का पिता के संपत्ति प बेटी के जन्मसिद्ध अधिकार होला? अक्सर ई सवाल उठेला आ लोग एक-दूसरा से पूछेला। हालांकि कई मायना में एह सवाल के साफ आ स्पष्ट जवाब होखला के

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डिजिटल डेस्क, बेंगलुरु। का पिता के संपत्ति प बेटी के जन्मसिद्ध अधिकार होला? अक्सर ई सवाल उठेला आ लोग एक-दूसरा से पूछेला। हालांकि कई मायना में एह सवाल के साफ आ स्पष्ट जवाब होखला के बावजूद, एह बात के लेके असमंजस हमेशा बनल रहेला।

अब एही बीच हाल ही में कर्नाटक हाई कोर्ट के एगो अइसन फैसला सामने आइल बा, जवना से ई उलझन बहुत हद तक साफ हो गइल बा। हाई कोर्ट एगो अमेरिकी निवासी बेटी के ऊ याचिका खारिज कर दिहलस, जवना में ऊ अपना पिता के ओर से बेचाइल संपत्ति में हिस्सा मांगे रहली।

हाई कोर्ट के ओर से एह याचिका के खारिज कइला के बाद अब नया-नया सवाल उठे लागल बा। अब सवाल ई बा कि जब कानूनी रूप से बेटी के अपना पिता के संपत्ति में अधिकार बा, त कोर्ट याचिका के खारिज काहे कइलस? कानून का कहेला? आईं, जानल जाव।

पहिले समझीं कि पूरा मामला का रहल?

बता दी कि अमरीका में रहे वाली एगो महिला अपना माई-बाप आ बहिन के खिलाफ कोर्ट में मुकदमा दायर कइले रहली। उनकर दावा रहल कि उनकर पिता जे संपत्ति बेचले बाड़न आ परिवार के लगे जे दोसर संपत्ति बा, ऊ सभ ‘पैतृक’ या संयुक्त परिवार के संपत्ति ह।

हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 2005 के संशोधन के हवाला देत महिला के तर्क रहल कि बेटी होखे के नाते जन्म से ही एह संपत्तियन प बेटा लोग के बराबर अधिकार बा। ऊ सोना के गहना, बैंक डिपॉजिट आ दोसर अचल संपत्तियन में बराबर हिस्सा मांगले रहली। ट्रायल कोर्ट के बाद मामला कर्नाटक हाई कोर्ट पहुंचल, जहवा अदालत बेटी के याचिका खारिज क दिहलस।

हाई कोर्ट बेटी के याचिका काहे खारिज कइलस?

एह बात के अइसन समझीं कि कोर्ट में पेश कइल गइल सबूत आ खुद महिला के गवाह उनकर चाचा के बयान से ई साबित भइल कि विवादित संपत्ति Schedule A, C आ D उनकर दादाजी अपना कमाई से खुद खरीदले रहले। यानी ई संपत्तियां उनकर ‘स्वअर्जित’ संपत्ति रहली।

बंटवारा के बाद बदल जाला संपत्ति के रूप

दोसर ओर, सबसे जरूरी बात ई बा कि जब दादाजी अपना कमाई से खरीदल संपत्ति के बंटवारा अपना बच्चा लोग के बीच कइलन, त ऊ संपत्ति उनकर बच्चा लोग खातिर अलग/व्यक्तिगत संपत्ति बन गइल।

अइसन में जब मामला हाई कोर्ट पहुंचल, त कोर्ट साफ कइलस कि 2005 के संशोधन के तहत बेटी लोग के पैतृक या संयुक्त परिवार के संपत्ति में जन्म से अधिकार मिलेला। बाकिर एकर मतलब ई ना ह कि माता-पिता के हर निजी या व्यक्तिगत संपत्ति प बेटी जन्म से ही दावा कर सकेली।

एह फैसला के का मतलब बा?

गौर करे वाला बात बा कि कानूनी जानकारन के कहना बा कि ई फैसला एगो बड़हन गलतफहमी दूर करेला। कोर्ट साफ कइलस कि लोग अक्सर मान लेला कि जे संपत्ति दादा या परदादा के समय से चलत आ रहल बा, ऊ अपने आप ‘पैतृक संपत्ति’ बन जाला। बाकिर अगर ऊ संपत्ति दादाजी अपना पैसा से खुद खरीदले रहले, त ऊ बाद में उनकर बच्चा लोग के व्यक्तिगत संपत्ति बन सकेला।

पिता के अपना संपत्ति पर पूरा हक

एकरा अलावा, अगर कवनो संपत्ति पिता के अपना कमाई के बा या आपसी पारिवारिक बंटवारा में उनकरा मिलल बा, त पिता के ओकरा बेचs या अपना हिसाब से इस्तेमाल करे के पूरा अधिकार होला। एह पर बच्चा, चाहे बेटा होखे या बेटी, पिता के जिंदा रहत जन्मसिद्ध अधिकार के दावा ना कर सकेला।

अब पिता के मौत के बाद का होई, ई समझीं

सबसे ज्यादा ध्यान देवे वाली बात ई बा कि ई मामला जिंदा पिता के संपत्ति के बंटवारा से जुड़ल रहल। अगर पिता के मौत बिना वसीयत बनवले हो जाला, त उनकर उत्तराधिकारी लोग, जेमें बेटी लोग भी शामिल बा, सभे के कानून के मुताबिक बराबर हिस्सा मिलेला।

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