सद्गुरु के संदेश: ब्रह्मचर्य के वास्तविक अर्थ आ भीतर के आनंद के राह
सद्गुरु के मुताबिक, मन के खुशी आ स्वस्थ जीवनशैली खातिर योग कइल बढ़िया बा। बाकिर जब कवनो आदमी के जीवन में भौतिक दुनिया से परे के कवनो चीज सबसे महत्वपूर्ण हो जाए, तब ओकरा के जबरदस्ती सामान्य लोग जइसन जीवन जीए खातिर मजबूर कइल जाव, त ओकर जीवन यातना आ नरक जइसन हो सकेला।
अगर कवनो आदमी अकेले आध्यात्मिक राह पर चले के चाहत बा, बाकिर ओकरा के अइसन व्यक्ति के साथे चलल मजबूर कइल जाव जे एह राह पर चले के इच्छुक नइखे, त दुनु लोग खातिर परेशानी पैदा हो सकेला। ओही तरह, जे व्यक्ति विवाह करे के चाहत बा, ओकरा के जबरदस्ती ब्रह्मचर्य के दीक्षा दे दिहल जाव, त ई भी ओकरा खातिर एगो अलग तरह के यातना बन सकेला।
ब्रह्मचर्य आखिर ह का?
ब्रह्मचर्य तब जीवन में आवेला, जब आदमी के ई एहसास होखे लागेला कि खुशी, आनंद आ शांति खातिर हमेशा बाहर के दुनिया के ओर देखे के जरूरत नइखे। असली आनंद अपना भीतर खोजे के पड़ेला। जब कवनो व्यक्ति एह बात के समझ लेला, त ओकर ध्यान भीतर के यात्रा पर जाए लागेला। अगर ऊ एह राह पर ना चले, त ऊ खुद खातिर आ अपना आसपास के लोग खातिर दुख के कारण बन सकेला।
हमनी सभे आम खइले बानी, बाकिर कतना लोग आम के पेड़ लगवले, ओकर देखभाल कइले आ फेर ओकर फल खइले? ज्यादातर लोग आम एहसे खा पावेला, काहे कि केहू दोसर आदमी आम के पेड़ लगवले आ ओकर देखभाल कइले रहे।
ठीक ओइसहीं समाज में कुछ लोगन के ब्रह्मचर्य के राह अपनावे के जिम्मेदारी लेवे के पड़ेला। जइसे हर समाज में कुछ लोग आम के पेड़ लगावेला, ओइसहीं कुछ लोग आध्यात्मिक राह के समर्पित रूप से अपनावेला।
ब्रह्मचारी के मतलब का होला?
‘ब्रह्म’ के अर्थ ईश्वरीय आ ‘चर्या’ के अर्थ राह या जीवन के तरीका मानल गइल बा। एह हिसाब से जे व्यक्ति ईश्वरीय राह पर चलेला, ऊ ब्रह्मचारी कहल जा सकेला।
लोग के लाग सकेला कि ब्रह्मचारी जीवन के सुख छोड़ देले बा, बाकिर सद्गुरु के अनुसार बात अइसन नइखे। अगर केहू खाली कपड़ा-पहनावा या बाहरी रूप से ब्रह्मचारी बनल बा, त ओकर जीवन यातना बन सकेला। बाकिर जे व्यक्ति सच्चा अर्थ में ईश्वरीय राह पर बा, ओकरा खातिर दुनिया के छोट-छोट सुख धीरे-धीरे महत्वहीन हो जाएला। जब आदमी अपना भीतर के आनंद के अनुभव कर लेला, त बाहरी सुख ओकरा सामने फीका लागे लागेला।
का सभे के ब्रह्मचारी बनल जरूरी बा?
ना। हर आदमी के ब्रह्मचर्य के भावना अपना भीतर जगावे के चाहीं, जरूरी नइखे कि ऊ जीवनशैली के रूप में ब्रह्मचारी बने।
ब्रह्मचर्य के मतलब खाली भोग-विलास से दूर रहल नइखे। एकर असली मतलब बा—अपना अस्तित्व आ प्रकृति से आनंदित रहना। आदमी शादीशुदा होके भी ब्रह्मचारी हो सकेला, अगर ऊ अपना खुशी खातिर पति या पत्नी पर निर्भर ना होखे।
अगर दू गो लोग साथ आवेलन, त उनकर रिश्ता एक-दूसरा से खुशी छीने के ना, बल्कि आपन खुशी एक-दूसरा के साथ बांटे के होखे के चाहीं। सद्गुरु के संदेश के सार ई बा कि हर आदमी अपना भीतर से आनंदित रहे—काहे कि असली खुशी बाहर ना, भीतर के यात्रा में मिलेला।
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